महिला आरक्षण विधेयक: 27 साल पहले देवगौड़ा ने पहल की, अटल-मनमोहन ने भी किए प्रयास, अब तक क्यों नहीं हो सका पास? - क्या हो रहा है?


महिला आरक्षण विधेयक एक ऐसा कानून है जो यह सुनिश्चित करना चाहता है कि महिलाओं को सरकार में रहने का उचित मौका मिले। इसमें कहा गया है कि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में 33 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की जानी चाहिए। यह बिल संसद भवन में पेश किया गया और इस पर लोकसभा और राज्यसभा में चर्चा और वोटिंग होगी. यह पहली बार नहीं है जब लोगों ने इस तरह का कानून पारित करने की कोशिश की है, लेकिन अतीत में यह मुश्किल रहा है। महिला आरक्षण का विचार 1992 में शुरू हुआ जब महिलाओं को स्थानीय सरकार में एक तिहाई सीटें देने के लिए संविधान में बदलाव किया गया।

हमारे संविधान के नियमों के अनुसार,

पंचायती राज संस्थाओं (जो स्थानीय सरकारी निकाय हैं) में एक तिहाई सीटें और इन संस्थाओं में अध्यक्षों के एक तिहाई पद महिलाओं के लिए आरक्षित हैं। इसका मतलब यह है कि सभी सीटों और पदों में से एक तिहाई महिलाओं को दी जानी चाहिए। इसी प्रकार, प्रत्येक नगर पालिका (जो एक स्थानीय सरकारी निकाय भी है) में, प्रत्यक्ष चुनाव के माध्यम से भरी जाने वाली कम से कम एक तिहाई सीटें महिलाओं को दी जानी चाहिए। यह सुनिश्चित करना है कि महिलाओं को इन महत्वपूर्ण निर्णय लेने वाले निकायों का हिस्सा बनने का उचित मौका मिले।

महिला आरक्षण विधेयक का क्या मामला है?


अंततः, हमेशा की तरह, वे संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को 33% प्रतिनिधित्व देने के लिए कदम उठा रहे हैं। लेकिन अंदाज़ा लगाओ कि क्या है? यह सब 1996 में शुरू हुआ जब एचडी देवेगौड़ा के नेतृत्व वाली संयुक्त मोर्चा सरकार ने 81वां संविधान संशोधन विधेयक पेश किया। इस बिल को उस समय के कानून मंत्री रमाकांत डी खलप द्वारा लोकसभा में लाया गया था, क्योंकि सत्ता पक्ष इस पर सहमत नहीं हो सका था।

लालू प्रसाद, मुलायम सिंह यादव और शरद यादव जैसे कई नेताओं ने इसके खिलाफ बोलते हुए कहा कि इसे बदलने की जरूरत है। आख़िरकार, बिल को गीता मुखर्जी के नेतृत्व वाली संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) को भेजा गया, जो उस समय लोकसभा की सदस्य थीं।

अटल सरकार में भी खरीदे गए कारखाने

जापानसी ने नौ दिसंबर 1996 को 11वें संस्करण में अपनी पेशी की रिपोर्ट दी। बाद में 26 जून 1998 को अटल बिहारी वाजपेई के नेतृत्व वाली 84वीं संविधान संशोधन अकादमी को 12वीं छमाही में फिर से पेश किया गया। 1998 में जब इस क्लिनिक में वकालत के लिए वकील कानून मंत्री थांबी दुराई गए थे। उस वक्त लोकसभा में भारी बारिश हुई। यहां तक ​​कि योजना भी हुई। कुछ कलाकारों ने अपने हाथ से कारखाने की प्रति लेकर आम लोगों में ही बनाई थी।

इसे 2002 में और 2003 में सदन में लाया गया था, लेकिन फिर भी यह मकान मालिक नहीं हो सका।

क्या मोदी सरकार अभी पारित करा सकती है बिल?

भारत में महिलाओं को सत्ता संभालने के अधिक अवसर देने के लिए सरकार एक नया कानून बनाना चाहती है। पहले, वे इस कानून के सटीक नियमों पर सहमत नहीं हो सके, लेकिन अब सरकार के अधिकांश महत्वपूर्ण समूह इसे पारित करने के लिए मिलकर काम कर रहे हैं। यह कानून यह सुनिश्चित करने में मदद करेगा कि महिलाओं को सरकार में नेता बनने का उचित मौका मिले।

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